क्यों गुजरात में एक भी प्रवासी मजदूर नहीं लौटा!

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पलायन की समस्या देश की बडी समस्याओं में से एक है, और तकरीबन यह हर राज्य में है, ऐसे में गुजरात एक रोशनी पैदा करता है. यदि वाकई ऐसा है तो गुजरात की इस उपलब्धि का विश्लेषण किया जाना चाहिए और उसकी सीखों का उपयोग हर राज्य में किया जाना चाहिए.

Source: News18Hindi
Last updated on: February 10, 2021, 10:12 AM IST

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भारत में कोविड-19 के शुरुआती दौर में हमने लाखों मजदूरों को सड़कों पर पैदल चलकर अपने घर वापस लौटते देखा. आश्चर्य की बात है कि इनमें गुजरात का कोई भी मजदूर शामिल नही है. यह आंकड़ा हमें आश्चर्य में डालता है, लेकिन आशा भी जगाता है कि कोई राज्य ऐसा भी हो सकता है जहां पर पलायन की समस्या को इस हद तक काबू में कर लिया गया है कि वहां से कोई मजदूर मजदूरी करने बाहर नहीं जाता. पलायन की समस्या देश की बडी समस्याओं में से एक है, और तकरीबन यह हर राज्य में है, ऐसे में गुजरात एक रोशनी पैदा करता है. यदि वाकई ऐसा है तो गुजरात की इस उपलब्धि का विश्लेषण किया जाना चाहिए और उसकी सीखों का उपयोग हर राज्य में किया जाना चाहिए.

लोकसभा में हाल ही में एक सवाल के जवाब में श्रम और रोजगार राज्यमंत्री स्वतंत्र प्रभार संतोश गंगवार ने हाल में अपने राज्य लौटे प्रवासियों का ब्यौरा प्रस्तुत किया है. पेश की गई जानकारी में बताया है कि देश के सभी राज्यों में एक करोड़ चौदह लाख तीस हजार नौ सो अडसठ प्रवासी मजदूर अपने गृह राज्यों को लौटे हैं. इनमें सबसे ज्यादा साढे बत्तीस हजार प्रवासी मजदूर उत्तरप्रदेश लौटे हैं. इसके बाद बिहार में पंद्रह लाख के करीब प्रवासी वापस वापस आए. राजस्थान में तेरह लाख मजदूर वापस लौटे. ममता दीदी के बंगाल में तेरह लाख चौरासी हजार प्रवासी मजदूरों को वापस लौटना पड़ा. ओडिसा में साढ़े आठ लाख और मध्यप्रदेश में साढे सात लाख मजदूरों को वापस लौटना पड़ा. सबसे ज्यादा अनाज उपजाने वाले पंजाब में भी सवा पांच लाख मजदूरों के वापस लौटने का आंकडा पेश किया गया है. छत्तीसगढ और झारखंड भी उन राज्यों में शामिल हैं जहां पर कि पांच लाख से ज्यादा मजदूर वापस आए.

इस सूची में गुजरात को छोडकर देश के सभी राज्य शामिल हैं जहां पर कि मजदूर लौटे हैं, केवल गुजरात ही वह अकेला राज्य है जहां कि कोई भी मजदूर नहीं लौटा है. इसका एक मतलब यह है कि वहां पर रोजगार और तमाम छोटे उदयोग धंधे इतने अच्छे से काम कर रहे हैं कि कोई भी नागरिक पलायन नहीं करता है और दूसरा यह कि यदि करता भी है तो उसकी स्थिति इतनी अच्छी है कि उसे महामारी या लाॅकडाउन जैसी किसी भी स्थिति में वापस घर नहीं लौटना पड़ता. हमने देखा है कि लौटने वालों में ज्यादातर कामगार मजबूर रहे हैं, वह अपने परिवार के साथ सैकडों किलोमीटर तक पैदल भी चले हैं.

कोई परिवार पलायन नहीं करे इसके लिए सालों से सरकारें कोशिश करती रही हैं. पलायन की अपनी दुखद गाथाएं हमेषा होती हैं. पलायन से बच्चों की पढाई, महिलाओं का स्वास्थ्य, गांव में पीछे छूटे बुजुर्ग बुरी तरह से प्रभावित होते हैं. भारत में ज्यादातर पलायन मजबूरी का है, क्योंकि स्थानीय स्तर पर उन्हें रोजगार नहीं मिल पाता है. इसके तरह-तरह के व्यव्हार भारत में देखने को मिलते हैं. पलायन से बहुत बार लोगों को योजनाओं का भी पूरा लाभ नहीं मिल पाता है. इन तमाम स्थितियों को देखते हुए इसे रोकने के उपाय किए गए हैं, लेकिन वह बदस्तूर जारी है. यूपीए सरकार की महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम का भी यह लक्ष्य था कि लोगों को पंचायत स्तर पर सौ दिन के रोजगार की गारंटी देकर पलायन की समस्या को रोका जाए.

यूपीए सरकार के रहते तक यह योजना करीब चालीस हजार करोड़ रूपए की थी जिसे अब एनडीए सरकार भी तकरीबन बहत्तर हजार करोड़ रूपए के बजट से संचालित कर रही है. कोविड के समय भी इस योजना में अतिरिक्त आवंटन करके ग्रामीण मजदूर परिवारों को रोजगार देने की पहल की गई. पर इतने सालों के बाद भी पलायन जैसी समस्या से निजात नहीं पाया जा सका है, बल्कि कोविड19 के समय घर लौटते मजदूरों की तस्वीरों ने हमें यह बताया है कि पलायन की समस्या अब भी कितनी भयावह है! शहर में इन मजदूरों की असुरक्षा इतनी बड़ी है कि वह महीने-दो महीने भी अपने घरों में नहीं बैठ सकते. उस स्थिति में भी नहीं जबकी घरों में रहने को कहा गया हो.

नीति आयोग ने प्रवासी कामगारों के लिए राष्ट्रीय कार्यनीति तैयार करने के लिए एक उपसमूह गठित किया है। इस उपसमूह को गुजरात के बारे में जरूर विचार करना चाहिए और इस बात का अध्ययन करवाना चाहिए कि उसने यह कमाल कैसे किया? आखिर वहां कौन से तरीके अपनाए जा रहे हैं जिससे कोई भी मजदूर वापस नहीं लौटा. यदि यह आंकड़ा वाकई सच है तो देश के उन राज्यों को अपने यहां रोजगार वाले विकास के मॉडल को अपनाना चाहिए. पलायन का सबसे बड़ा दंश झेल रहे उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी को तुरंत गुजरात जाकर यह समझना चाहिए कि वह अपने राज्य के मजदूरों के लिए क्या कुछ करें जिससे कि पलायन सीमित हो सके.

लेकिन उसके लिए सरकार को यह मानना होगा कि पलायन एक समस्या है. लोकसभा में पेश किए गए जवाब में बताया गया है कि जितने भी मजदूर अपने राज्यों को वापस लौटे थे वे सभी अपने कार्यस्थलों पर लौट गए हैं. हालांकि सरकार ने प्रवासी कामगारों के लिए रोजगार तथा आजीविका के अवसर बढ़ाने के लिए गरीब कल्याण रोजगार योजना शुरू की. इस योजना में पचास हजार करोड़ रूपए डाले गए हैं. छह राज्यों के 116 जिलों में इस अभियान के तहत 39293 करोड़ रूपए का व्यय किया जा चुका है. बताया गया है इससे पचास करोड़ से ज्यादा कार्यदिवसों का रोजगार पैदा किया गया है. यह निवेश अच्छा संकेत देता है, लेकिन यदि इस समस्या को वाकई दूर करना है तो इससे भी एक कदम आगे जाकर इस बात पर गंभीरता से सोचना चाहिए कि स्थानीय स्तर पर लोगों को रोजगार कैसे मिल सकता है?(ये लेखक के निजी विचार है.)


ब्लॉगर के बारे में

राकेश कुमार मालवीयवरिष्ठ पत्रकार

20 साल से सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता, लेखन और संपादन. कई फैलोशिप पर कार्य किया है. खेती-किसानी, बच्चों, विकास, पर्यावरण और ग्रामीण समाज के विषयों में खास रुचि.

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First published: February 10, 2021, 10:12 AM IST

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