दलाई लामा और हांगकांग के मुद्दे पर अमेरिका समेत 5 देशों ने चीन पर कसा शिकंजा

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वाशिंगटन/बीजिंग. हांगकांग (Hong Kong) के मुद्दे पर अमेरिका (US) की अगुवाई में पांच देशों के एक समूह ने चीन (China) से कहा कि वह ‘जनप्रतिनिधि’ का चुनाव करने के हांगकांग के लोगों के अधिकारों को कम ना करे. इस समूह में अमेरिका के अलावा ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, न्यूजीलैंड और ​ब्रिटेन शामिल है. उधर अमेरिका ने स्पष्ट कर दिया है कि चीन के पास अगला दलाई लामा (Dalai Lama) चुनने का कोई अधिकार नहीं है, वह बौद्ध धर्मावलंबियों पर धौंस जमा बंद करे.

इन पांच देशों के विदेश मंत्रियों ने संयुक्त बयान जारी कर हांगकांग के निर्वाचित जनप्रतिनिधि को अयोग्य करार देने के लिये चीन द्वारा लागू किये गये नये नियम के संबंध में अपनी गंभीर चिंता दोहराई. हांगकांग में इन दिनों जमकर विरोध प्रदर्शन हो रहा है. इस बीच विदेश मंत्रियों ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू करने एवं सितंबर में होने वाले विधान परिषद चुनाव को स्थगित किये जाने बाद, इस फैसले ने हांगकांग की उच्च स्तर की स्वायत्तता एवं अधिकारों और स्वतंत्रता को कमजोर कर दिया है. इसी को लेकर हांगकांग में हिंसक प्रदर्शन हो रहे हैं, जिसमें काफी लोगों की मौत भी हो चुकी है. अमेरिका समेत कई देश इसका विरोध कर रहे हैं.

हांगकांग के लोगों के अधिकारों को सुनिश्चित करे चीन
विदेश मंत्रियों ने संयुक्त बयान जारी कर कहा है, ‘हम संयुक्त घोषणा एवं ‘बेसिक लॉ’ को ध्यान में रखते हुए चीन से जन प्रतिनिधि चुनने के हांगकांग के लोगों के अधिकारों को कम ना करने का आग्रह करते हैं. हांगकांग की स्थिरता एवं समृद्धि की खातिर, यह आवश्यक है कि चीन और हांगकांग के अधिकारी वहां के लोगों की चिंताओं और विचारों को अभिव्यक्त करने वाले माध्यमों का सम्मान करें.’ साथ ही कहा गया है कि चीन की यह कार्रवाई कानूनी रूप से बाध्यकारी और संयुक्त राष्ट्र में पंजीकृत, चीन-ब्रिटिश संयुक्त घोषणा के तहत उसके अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का स्पष्ट उल्लंघन है. इसमें कहा गया है कि यह चीन की उस प्रतिबद्धता का भी उल्लंघन है, जिसमें उसने कहा था कि हांगकांग को उच्च स्तर की स्वायत्तता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार होगा.चीन के पास अगला दलाई लामा चुनने का कोई आधार नहीं

अमेरिका के एक शीर्ष राजनयिक ने कहा है कि चीन के पास अगला दलाई लामा चुनने का कोई धार्मिक आधार नहीं है और बौद्ध धर्म के तिब्बती अनुयायी सैकड़ों साल से अपना आध्यात्मिक नेता सफलतापूर्वक चुनते आए हैं. अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता के लिए अमेरिका के विशेष राजदूत (एम्बेसेडर एट लार्ज) सैमुएल डी ब्राउनबैक ने अक्टूबर में भारत की अपनी यात्रा को याद करते हुए एक कांफ्रेंस कॉल के दौरान कहा कि वह भारत के धर्मशाला में तिब्बती समुदाय से बात करने और उन्हें यह बताने गए थे कि ‘अमेरिका चीन द्वारा अगला दलाई लामा चुने जाने के खिलाफ है.’

एक प्रश्न के उत्तर में सैमुएल ने कहा, ‘उनके (चीन) पास ऐसा करने का कोई अधिकार नहीं है. उनके पास ऐसा करने का कोई धार्मिक आधार नहीं है. बौद्ध धर्म के तिब्बती अनुयायी सैकड़ों बरसों से अपना नेता सफलतापूर्वक चुनते आए हैं और उनके पास अब भी ऐसा करने का अधिकार है.’ ब्राउनबैक ने कहा कि अमेरिका इस बात का समर्थन करता है कि धार्मिक समुदायों को अपना नेता चुनने का अधिकार है. इसमें अगले दलाई लामा भी शामिल हैं.’ ब्राउनबैक ने कहा, ‘हमारा मानना है कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी का यह कहना सरासर गलत है कि उन्हें इसका (दलाई लामा चुनने का) अधिकार है.’

भारत में रह रहे हैं दलाई लामा
14वें दलाई लामा (85) 1959 में तिब्बत से निर्वासित होकर भारत में रह रहे हैं. वह स्थानीय लोगों के विद्रोह पर चीनी कार्रवाई के बाद भारत आ गए थे. निर्वासन में रह रही तिब्बती सरकार हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला से काम करती है. भारत में 1,60,000 से अधिक तिब्बती रहते हैं. ब्राउनबैक ने चीन पर धार्मिक उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए कहा, ‘इससे उन्हें आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में मदद नहीं मिलेगी.’

ब्राउनबैक ने कहा कि चीन दुनिया को यह बताने की कोशिश कर रहा है कि यह आतंकवाद को रोकने की कोशिश है, लेकिन इससे वे और अधिक आतंकवादी पैदा करेंगे. उन्होंने कहा, ‘आतंकवाद से निपटने का तरीका सभी को बंद करके रखना नहीं है. आतंकवाद से निपटने के लिए धार्मिक स्वतंत्रता देना आवश्यक है.’ ब्राउनबैक ने चीन से अपील की कि वह उइगर, बौद्ध धर्म के तिब्बती अनुयायियों, इसाइयों और फालुन गोंग समेत विभिन्न आस्थाओं पर हमला करना बंद करे.





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