दो मंदिरों की अनोखी दास्तां, पहाड़ों से मिला नाम, इंसानों से मिला रिश्ता

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रिपोर्ट- जावेद खान
रामगढ़. झारखंड के रामगढ़ में एनएच-33 के किनारे मायाटुंगरी पहाड़ पर स्थित महामाया मंदिर में 300 सौ वर्षो से पूजा-अर्चना होती आ रही है. 11 सौ फीट की ऊंचाई पर स्थित इस मंदिर तक जाने के लिए 367 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं. इस मंदिर का ज़िक्र 1908 और 1932 के सर्वे में भी है. शुरुआत में आस-पास के 7 गांव के लोग यहां पूजा करने आते थे. लेकिन अब दूर-दूर से लोग यहां पहुंचते हैं.

स्थानीय लोगों का कहना है कि जब प्राकृतिक आपदा, महामारी और खेती के लिए वर्षा नहीं होती थी, तब ग्रामीण महिलाएं यहां जल अर्पित करती थीं. जिसके बाद खूब वर्षा होती थी. और महामारी भी नियंत्रित हो जाता था. आज भी यह परंपरा जारी है.

पूर्व में इसे माया दीदी मंदिर के नाम से जाना जाता था. बोकारो के लुगू दीदी (लुगू पहाड़) पर स्थित मंदिर के बहन के रूप में माया दीदी मंदिर का नाम दिया गया था. दोनों बहनों का मिलन अजगर के रूप में होता है, ऐसी मान्यता है. इसलिए आज भी यहां के सात गांवों में लोग अजगर सांप को नहीं मारते हैं.

इस मंदिर के ठीक नीचे शंकर भगवान का गुफा है. मान्यता के अनुसार नवरात्रा के समय अजगर के रूप में माया दीदी गुफा से मंदिर में प्रगट होती है. लोगों के मुताबिक साल 1983 में एक कार मैकेनिक को सपना आया और वह इस पहाड़ पर आया, जहां उसे माया दीदी का मंदिर मिला. उसके बाद से यहां दुर्गा पूजा की शुरुआत की गई. मंदिर में वैष्णव पद्धति से पूजा होती है. नवरात्र के समय यहां ओडिशा, बिहार, यूपी, बंगाल, एमपी के हजारों श्रद्धालू आते हैं.

महामाया मंदिर समिति के अध्यक्ष दामोदर महतो बताते हैं कि यहां 300 वर्षो से पूजा की परंपरा चली आ रही है. ये परंपरा आज भी कायम है. मायाटुंगरी से सटे सात गांवों की महिलाएं आज भी अच्छी बारिश के लिए यहां विशेष पूजा करती हैं. कोरोना महामारी के खात्मे के लिए भी पूजा किया गया.

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