विराट कोहली की कप्तानी पर संकट! अलग फॉर्मेट में अलग कप्तान की मांग में कितना दम?

Spread the love

नई दिल्ली. भारत ने जब से ऑस्ट्रेलिया (India vs Australia) को उसके घर में हराया है, तब से टीम इंडिया में अलग-अलग कप्तान बनाने की मांग फिर सिर उठाने लगी है. ऐसी मांग दिग्गज क्रिकेटर भी कर रहे हैं. सोशल मीडिया में ऐसे दलीलों की भरमार है, जिसमें अलग-अलग कप्तान होने के फायदे गिनाए गए हैं. हाल ही में एक अखबार ने भी अपने एनालिसिस में बताया कि ऑस्टेलिया, इंग्लैंड और वेस्टइंडीज ने कैसे अलग-अलग फॉर्मेट में अलग कप्तान बनाकर कामयाबी हासिल की है. हालांकि, गंभीरता से देखें तो ऐसे एनालिसिस बेहद सतही नजर आते हैं.

अलग-अलग फॉर्मेट में अलग-अलग कप्तान. इस मसले पर बात करने से पहले टीम इंडिया और उसकी कप्तानी पर नजर डाल लेते हैं. विराट कोहली (Virat Kohli) ने टीम इंडिया की कप्तानी पहली बार 2013 में की. वे साल 2017 से भारतीय टीम के तीनों फॉर्मेट (टेस्ट, वनडे, टी20) के कप्तान हैं. हालांकि, इस दौरान रोहित शर्मा (Rohit Sharma) और अजिंक्य रहाणे (Ajinkya Rahane) ने भी कुछ मैचों में कप्तानी की है, लेकिन ऐसा तभी हुआ है जब विराट कोहली किसी वजह से टीम से बाहर रहे हों. रोहित और रहाणे दोनों ने ही ऐसे मौकों पर दिखाया कि उनमें बेहतर कप्तान के सारे गुण हैं.

आखिर कप्तानी को परखने का सर्वश्रेष्ठ तरीका क्या हो सकता है? इसके जवाब में जो बात सबसे पहले आती है, वह है परिणाम. अगर कोई कप्तान अपनी टीम को जीत दिला रहा है तो उसे कामयाब माना ही जाएगा. ऐसे में उसकी कप्तानी में तब तक सवाल नहीं उठाए जा सकते जब तक कि वह जीत की आड़ में साथियों से भेदभाव ना कर रहा है या खेल को नुकसान ना पहुंचा रहा हो.सबसे पहले परिणाम की बात कर लेते हैं. विराट कोहली ने भारत को अब तक वनडे में 71%, टेस्ट में 59% और टी20 मैचों में 66% जीत दिलाई है. कोहली जैसी जीत का विशाल नंबर भारत तो क्या, किसी और देश के कप्तान के पास भी नहीं हैं. ऐसे में अगर रोहित या रहाणे कप्तान के तौर पर कुछ मैच जिता देते हैं तो उन्हें स्थानापन्न से स्थायी कमान दिए जाने की मांग जायज नहीं लगती. वैसे भी ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब किसी स्थानापन्न कप्तान ने भारत को बेहतरीन दिलाई हो. गौतम गंभीर से लेकर सुरेश रैना के कप्तानी के आंकड़े इसकी गवाही देते हैं.

विराट कोहली और अजिंक्य रहाणे.

दूसरी बात, क्या विराट कोहली कप्तानी का फायदा उठाकर किसी खास खिलाड़ी को फायदा या नुकसान पहुंचाते हैं? पहली नजर में विराट पर ऐसे आरोप नहीं लगते. अगर ऋषभ पंत, केएल राहुल, हार्दिक पांड्या को छोड़ दें तो ऐसा कोई नाम याद नहीं आता, जिसके बारे में यह कहा जा सके कि विराट ने इन्हें जरूरत से ज्यादा मौके दिए. संयोग से इन तीनों ने खुद को साबित कर कोहली का मान ही बढ़ाया है. वैसे भी कप्तान द्वारा किसी को कम या ज्यादा मौके देने के आरोप कसौटी पर खरे नहीं उतरते क्योंकि यह उसका विशेषाधिकार होता है. सौरव गांगुली, एमएस धोनी ने भी अपने इस विशेषाधिकार का पूरा इस्तेमाल किया था.

विराट कोहली ऑस्ट्रेलिया के स्टीव स्मिथ (Steve Smith) जैसे ‘मौकापरस्त’ कप्तान भी नहीं हैं, जो जीत के लिए कोई ऐसा काम करें जो खेलभावना के विपरीत हो. सब जानते हैं कि बेहतरीन कप्तान में शुमार स्मिथ सरेआम बॉल टैम्परिंग को बढ़ावा दे रहे थे और इस कारण बैन भी हो चुके हैं.

india vs australia, ind vs aus, Steve smith century, भारत-ऑस्ट्रेलिया, स्टीव स्मिथ, क्रिकेट

स्टीव स्मिथ बॉल टैम्परिंग के चलते बैन झेल चुके हैं.

अब उन देशों की बात कर लेते हैं, जो अलग-अलग कप्तानों के दम पर अलग-अलग फॉर्मेट में कामयाबी हासिल कर रहे हैं. ऐसे देशों में इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज के नाम गिनाए जाते हैं. पहली नजर में ये उदाहरण सही लगते हैं क्योंकि इंग्लैंड ने उन ऑयन मोर्गन की कप्तानी में वनडे वर्ल्ड कप जीता, जो टेस्ट टीम में हैं ही नहीं. वही इंग्लैंड जो रूट (Joe Root) की कप्तानी में श्रीलंका को उसके घर में टेस्ट सीरीज हराता है. ऑस्ट्रेलिया ने भी टेस्ट टीम की कमान टिम पैन और वनडे टीम की कमान एरॉन फिंच को सौंप रखी है. वेस्टइंडीज ने भी जब टी20 वर्ल्ड कप जीता, उन दिनों उसके अलग-अलग फॉर्मेट में अलग-अलग कप्तान थे.

तो क्या अलग फॉर्मेट में अलग कप्तान का फॉर्मूला, कामयाबी की ऐसी गारंटी दे सकता है, जो एक कप्तान के रहते संभव ना हो. जवाब है- बिलकुल नहीं. इंग्लैंड, ऑस्ट्रेलिया और वेस्टइंडीज की कामयाबी के उदाहरण इत्तफाक से अधिक कुछ नहीं हैं. इन देशों ने अलग-अलग कप्तान का फॉर्मूला किसी वैज्ञानिक सोच नहीं, बल्कि मजबूरी की वजह से अपनाया हुआ है. इंग्लैंड के ऑयन मॉर्गन के पास वह टैम्प्रामेंट नहीं है, जो टेस्ट क्रिकेटर का होना चाहिए. मॉर्गन का पूरा सम्मान रखते हुए यह कहा जा सकता है कि वे टेस्ट में फेल हैं. वहीं, ऑस्ट्रेलिया के टेस्ट कप्तान टिम पैन को बिग बैश लीग (BBL) की टीम में भी जगह नहीं मिली. टिम पैन हाल ही में इस टी20 लीग में बेंच पर बैठकर साथियों का हौसला बढ़ाते देखे गए. अब अगर ऐसे कप्तानों की तुलना अगर विराट कोहली या केन विलियम्सन जैसों से की जाए तो समझ से परे है. कोहली और विलियम्सन हर फॉर्मेट में ना केवल फिट हैं, बल्कि सुपरहिट हैं.

रोहित शर्मा और विराट कोहली.

विराट कोहली की जगह किसी और खिलाड़ी को किसी और फॉर्मेट में कप्तान बनाने की मांग 2018 से ही हो रही है. पहली बार इस मांग ने तब जोर पकड़ा था, जब भारत ने रोहित शर्मा की कप्तानी में एशिया कप जीता था. इस टूर्नामेंट के दौरान चयनकर्ताओं ने विराट को आराम दिया था. उनका मानना था कि इस टूर्नामेंट में भारत के सामने कोई बड़ी चुनौती नहीं है. लेकिन जैसे ही भारत ने यह खिताब जीता, रोहित की कप्तानी की कसीदे गढ़े जाने लगे. कहा गया कि रोहित को वनडे और टी20 टीम का कप्तान बना दिया जाए और विराट टेस्ट टीम की कमान संभालें.

यह भी पढ़ें: इंग्लैंड टीम पर छाया विराट कोहली का खौफ, मोईन अली बोले-पता नहीं कैसे आउट करेंगे

दरअसल, यह ‘अलग-फॉर्मेट-अलग कप्तान’ के फॉर्मूले के बहाने विराट का शिकार करने की कोशिश है. सभी जानते हैं कि विराट का कद इतना बड़ा हो गया है कि उनसे सीधे पंगा लेने की हिम्मत अच्छे-अच्छे खां भी नहीं कर पा रहे हैं. इसलिए जो पूर्व खिलाड़ी या क्रिकेट विशेषज्ञ विराट से सीधे सवाल नहीं कर सकते या उनकी कप्तानी की खामियां सीधे गिनाने से बचते हैं, वे रोहित शर्मा या अजिंक्य रहाणे के कंधों पर बंदूक रखकर निशाना साध रहे हैं.

यह भी पढ़ें: विराट कोहली के पास महेंद्र सिंह धोनी-रिकी पोंटिंग को पीछे छोड़ने का मौका

यह बहस का विषय है कि विराट कोहली अच्छे कप्तान हैं या खराब. अगर वे खराब कप्तान हैं तो उन्हें बेशक हटाया जाना चाहिए. उनकी जगह दूसरे खिलाड़ी को टीम की कमान सौंपी जानी चाहिए. लेकिन यह बात स्थापानापन्न कप्तान के प्रदर्शन से तुलना के आधार पर की जा रही है तो ठीक नहीं है. किसी कप्तान के चार साल के बेहतरीन रिकॉर्ड की तुलना दूसरे कप्तान के एक सीरीज से नहीं की जा सकती.
एक और बात, जो विराट को कप्तानी से हटाने के लिए दिया जाता है वह है कि तीनों फॉर्मेट में कप्तानी करने से बनने वाला दबाव. हमारे कई पूर्व खिलाड़ी, कॉमेंटेटर, या खुद को विशेषज्ञ मानने वाले प्रशंसक भी यह तर्क देते हैं. लेकिन इनमें से किसी ने शायद ही यह बात तब कही हो, जब धोनी भारत की तीनों टीमों के कप्तान होते थे. न्यूजीलैंड के केन विलियम्सन (Kane Williamson) भी तीनों फॉर्मेट के कप्तान हैं. बेहतरीन और बेजोड़ कप्तान. उन पर भी कोहली से कम दबाव नहीं होता हो. लेकिन जो लोग कोहली से ‘सहानुभूति’ रखते हुए उनका दबाव बांटने की बात करते हैं, वे विलियम्सन को भूल जाते हैं.

india vs australia, 1st test, virat kohli, prithvi shaw, Marnus Labuschagne, भारत-ऑस्ट्रेलिया, विराट कोहली, पृथ्वी शॉ

कोहली मैदान पर हर वक्त जोश में नजर आते हैं.

कई लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें भद्र कहे जाने वाले क्रिकेट के खेल में कोहली का जोश और जुनून बुरा लगता है. कोहली जिस अंदाज में शतक का जश्न मनाते हैं या विकेट मिलने पर उछलते हैं, जोर से चिल्लाते हैं, वह ‘भद्र’ लोगों को बुरा लगता है. वे चाहते हैं कि कोहली भी विकेट मिलने के बाद धोनी, कुंबले, द्रविड़, रहाणे जैसे शांत रहें. लेकिन यह शायद खेल का वह पहलू है, जिसमें क्रिकेट शामिल नहीं है. इसलिए इस आधार पर कोहली को कप्तानी से तो हटाया नहीं जा सकता. आप बस इसे पसंद या नापसंद कर सकते हैं और यहीं पर यह बात आकर ठहर जाती है.

यह भी पढ़ें: IND VS ENG: जोस बटलर ने कहा- भारत में जीत के लिए 600-650 रन बनाने होंगे

और अंत में. अलग-अलग फॉर्मेट में अलग कप्तान हो या एक कप्तान. इनमें से कोई भी फॉर्मूला कामयाबी की गारंटी नहीं देता है. कामयाबी के लिए बेहतर टीम और बेहतर कप्तान होना चाहिए. भारत की टीम बेहतरीन है, इस पर कोई शक नहीं है. विराट कोहली का निजी प्रदर्शन तमाम दबावों के बावजूद सर्वश्रेष्ठ रहा है. वे भारत के सबसे फिट खिलाड़ियों में से एक हैं. इसलिए दबाव या फिटनेस की बात तो सिरे से खारिज हो जाती है. शायद, अलग-अलग फॉर्मेट में अलग-अलग कप्तान की सिफारिश करने वालों के लिए कुछ और तर्क ढूंढ़ने का वक्त है. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)

Source link


Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *