IND vs AUS 4th Test: टीम इंडिया ने तोड़ा कंगारुओं का 32 साल का गुरूर

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भारतीय टीम ने ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ चौथे टेस्ट मैच में शानदार जीत दर्ज की.

दुनिया के क्रिकेट प्रेमी एक अदभुत मैच के चश्मदीद बने हैं. ऑस्ट्रेलिया से इसी सीरीज में एक पारी में 36 रन पर आउट होने के बाद इस तरह से उठ खड़े होने की यह विलक्षण घटना क्रिकेट के इतिहास में मील का पत्थर बन गई है. चौथा टेस्ट मैच (Brisbane Test) जीतकर हम सीरीज जीत गए,

  • News18Hindi

  • Last Updated:
    January 19, 2021, 6:32 PM IST

नई दिल्ली. दुनिया के क्रिकेट प्रेमी एक अदभुत मैच के चश्मदीद बने हैं. ऑस्ट्रेलिया से इसी सीरीज में एक पारी में 36 रन पर आउट होने के बाद इस तरह से उठ खड़े होने की यह विलक्षण घटना क्रिकेट के इतिहास में मील का पत्थर बन गई है. चौथा टेस्ट मैच (Brisbane Test) जीतकर हम सीरीज जीत गए, यह उतनी खास बात नहीं है बल्कि उससे ज्यादा महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय यह है कि बेहद मुश्किल हालात में भारत की क्रिकेट टीम ने दुनिया के दिग्गज खिलाड़ियों से भरी ऑस्टेलियाई टीम (Australia) को हराया और वह भी गाबा ग्राउंड पर हराया.

गाबा में 32 साल बाद ऑस्ट्रेलिया हारा
गाबा का मैदान ऑस्ट्रेलिया का अभेद्य किला माना जाता था. चौथे मैच के पहले दुनियाभर के क्रिकेट विशेषज्ञ गाबा के आंकड़े याद दिला रहे थे. लेकिन लगातार पूरे पांच दिन भारतीय टीम (Team India) खेल के हर विभाग में एक भी सत्र में कमजोर नहीं पड़ी. इससे साबित होता है कि पुराने आंकड़ों से ज्यादा कुछ होता नहीं है. वैसे सही ही कहा जाता है कि कोई रिकॉर्ड बनता ही टूटने के लिए है.

क्रिकेट की शास्त्रीयता की मिसालक्रिकेट में किसी टीम का एक दिन या एक सत्र संयोगों पर निर्भर माना जाता है. लेकिन इस चौथे टेस्ट के पांचों दिन किसी एक टीम के पक्ष विपक्ष में नहीं बल्कि क्रिकेट की शास्त्रीयता के थे. पंद्रह सत्रों के टेस्ट मैच में एक भी सत्र ऐसा नहीं गया कि कोई विशेषज्ञ यह बता पाता कि फलां टीम कुछ आगे दिख रही है. तेज रफ्तार रन से लेकर सबसे ज्यादा संभलकर यानी संयत खेल के प्रदर्शन के लिए भी यह टेस्ट याद किया जाएगा. किसी भी पक्ष के किसी भी खिलाड़ी पर यह आरोप नहीं लगाया जा सकता कि उसने फिजूल में सुस्त खेला. मसलन पुजारा बार बार चोटिल होने के बाद भी अपूर्व रक्षात्मक खेल खेलते हुए 211 गेंदों तक क्रीज पर खड़े रहे. इसी तरह पंत के तेज खेलने पर भी कोई सवाल नहीं उठ सकता. खासबात यह रही कि दोनों खिलाड़ियों ने टेस्ट क्रिकेट की खूबसूरती या शास्त्रीयता को निरंतर बनाए रखा. खासतौर पर आखिरी पारी में पुजारा का क्रीज पर बने रहने का खेल शास्त्रीय खेल के कालजयी उदाहरण एकनाथ सोलकर से लेकर राहुल द्रविड़ की याद दिलाते रहेंगे.

भारत की पारी का वह 53 वां ओवर
यह तय करना बड़ा मुश्किल हो जाता है कि किसी मैच में टर्निंग प्वाइंट या खेल पलटने का पल कौन सा था. यह मैच तो शुरू से लेकर आखिर आखिर तक बिल्कुल संतुलन में दिखता रहा. इसीलिए एक समय जरूर आया जब दोनों टीमों को यह फैसला करना था कि वह जीतने के लिए खेले या ड्रॉ की रणनीति बना ले. यह था 53वां ओवर. इस बिंदु पर ऑस्ट्रेलिया की एक रणनीति दिखाई दी कि भारतीय खिलाड़ियों को खुलकर खेलने के लिए ललचाया जाए. गेंद स्टंप से दूर लेकिन बल्लेबाज की पहुंच में फेंकी जाने लगीं. और इसी ओवर में जब नौ रन बन गए तो यह तय हो गया कि अब यह मैच ड्रा के लिए नहीं, बल्कि हार-जीत के लिए खेला जा रहा है. क्रिकेट के गंभीर विश्लेषक यदि गौर कराना चाहें तो अपना संकोच छोड़कर यह बता सकते हैं कि ऑस्ट्रेलिया ने भी यह मैच सकारात्मक भाव से खेला. उन्होंने भारत को चुनौती दी और भारतीय खिलाड़ियों ने उस चुनौती को पूरे जज्बे से स्वीकार किया और मैच जीता.

रहाणे ने भी प्रशासकों की दुविधा बढ़ाई होगी
बेशक रहाणे मजबूरी में बनाए गए कप्तान नहीं थे. वे उपकप्तान थे और कोहली के पितृावकाश के कारण कप्तान बने थे. लेकिन उनके नेतृत्व में आश्चर्यजनक रूप से और निरंतरता के साथ प्रदर्शन ने यह सवाल तो उठा ही दिया है कि उन्हें भारतीय टीम का पूर्णकालिक कप्तान क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए. यह भी बिना संशय की बात है कि कोहली के प्रदर्शन में अभी कमी नहीं आई है. उनका निजी प्रदर्शन अभी उतार पर नहीं है. ऐसे में यह सवाल भी स्वाभाविक है कि क्या भारतीय टीम के हित में रहाणे के नेतृत्व में कोहली को खेलते हुए देखा जा सकता है. और ऐसी चर्चा शुरू करने वाले हवाला दे रहे हैं कि जब धोनी एक समय में आकर कोहली के नेतृत्व में खेल सकते थे तो इस तरह का विकल्प सोचने में अड़चन क्या हो सकती है. बहरहाल यह क्रिकेट प्रशासकों के सोचने की बात है और उनका जिस तरह से हौसला बुलंद है वे आसानी से भारतीय टीम का हित सोच ही लेंगे.




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