Kohli vs Rahane: अजिंक्य की कप्तानी को नजरअंदाज करने की कोशिश, ताकि विराट कमान संभालते रहें

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कई प्रतिभावशाली खिलाड़ियों को वैसा स्टारडम नहीं मिलता, जिसकी उन्हें अपेक्षा है. ताकतवरों के खेमे में शामिल नहीं होना उनका सबसे बड़ा गुनाह होता है. ऐसे में अजिंक्य रहाणे की अद्भुत कप्तानी की योग्यता को नजरअंदाज करने की कवायद चल रही है तो मुझे आश्चर्य नहीं है. पितृत्व अवकाश पर भारत लौट आए विराट कोहली ने जब टीम की कप्तानी की थी, तब भारत की प्रतिष्ठा तार-तार हो चुकी थी. एडिलेड टेस्ट में तो भारत की दूसरी पारी 36 रन पर ही सिमट गई थी, लगता था भारत यह टेस्ट सीरिज 0-4 से हारेगा.

लेकिन चीजें बदल गईं. अजिंक्य रहाणे के कप्तान बनते ही टीम में नई चेतना आ गई. कप्तानी संभालते ही रहाणे ने दूसरे टेस्ट में शानदार शतक जड़कर भारत को जीत के मुहाने पर ला दिया. यह मुश्किल परिस्थितियों में ऑस्ट्रेलिया के उछाल भरे विकेट पर खेली गई सर्वश्रेष्ठ पारियों में से एक मानी गई. फिर ककड़ी की तरह ठंडे कप्तान रहाणे ने क्षेत्ररक्षण व गेंदबाजी परिवर्तनों में अपनी योजनाएं शातिराना अंदाज में लागू की और भारत में यह दूसरा टेस्ट अप्रत्याशित तरीके से 8 विकेट से जीत लिया. सुनील गावस्कर से लेकर रिकी पोंटिंग तक ने रहाणे की कप्तानी, उनकी योजनाओं, क्षेत्ररक्षण जमाने की कुशलता व टीम को संचालित करने की चतुराई की प्रशांसा की.

फिर जब सभी बड़े सितारों के घायल होने के बाद बची-खुची सेना के साथ रहाणे ने चौथा टेस्ट भारत को जिता दिया और सीरीज पर 2-1से कब्जा कर लिया. तब यह प्रश्न उभर गया कि क्या रहाणे मौजूदा कप्तान विराट कोहली के मुकाबले बेहतर टेस्ट कप्तान हैं.

वैसे भारतीय क्रिकेट के हित में तो यही है कि इस तरह की तुलनाएं करके टीम को हिस्सों में न बांटा जाए. पर जिस फुर्ती से विराट के समर्थन में ताकतवरों ने मोर्चा संभाला, वह हैरान कर देने वाला था. मैनेजर व प्रशिक्षक रवि शास्त्री ने तो तुरंत कह दिया कि टीम एक प्रक्रिया का हिस्सा है और रहाणे तो इस प्रक्रिया के अंग भर हैं. यह सारी प्रक्रियाएं विराट कोहली के समय से ही लागू थीं. साफ जाहिर था कि अजिंक्य रहाणे की अद्भुत काबिलियत को कमतर आंकने की कोशिश हो रही थी. प्रश्न तो उठ ही रहे थे कि क्या टेस्ट क्रिकेट के बड़े प्रारूप में अजिंक्य रहाणे प्रसिद्ध विराट कोहली से बेहतर कप्तान साबित हुए हैं?

विराट कोहली विश्व क्रिकेट के उतने बड़े नायक हैं कि उनके व्यक्तित्व के तले बाकी खिलाड़ी दब जाते हैं और अपना मत व्यक्त करने में भी हिचकते हैं. इस तरह एक निष्पक्ष व स्वतंत्र राय उन्हें नहीं मिल पाती है. वह जीत व हार के प्रति भावुक बहुत ज्यादा हैं और उत्तेजित ही दिखाई देते हैं. यह उत्तेजना उनकी ऊर्जा भी प्रकट करती है. वहीं, अजिंक्य रहाणे एक मध्यमवर्गीय परिवार के ऐसे कप्तान दिखाई देते हैं, जिन्हें हर खिलाड़ी राय तो देता है पर जो उचित होता है उसी पर वह अमल करते हैं. उनके साथ कोई भी खिलाड़ी सितारा समझकर बर्ताव नहीं करता है.

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मुझे याद है कि सचिन तेंदुलकर के व्यक्तित्व व चमक के आगे राहुल द्रविड़ किस तरह दबे-दबे रहते थे. सचिन को जो सितारा हैसियत प्राप्त हुई. वह द्रविड़ को कभी नहीं हुई. द्रविड़ के साथ बल्लेबाजी क्रम में उठापटक भी बहुत हुई. कभी उन्हें ओपनिंग में भेजा गया, कभी तीसरे क्रम पर तो कभी छठे क्रम पर. कभी उनसे विकेटकीपिंग भी कराई गई. तुलना करें तो पाएंगे कि सचिन ने जब टेस्ट क्रिकेट में 15921 रन 53.79 के औसत से बनाए तो द्रविड ने 13288 रन 52.31 के औसत से इकट्ठे किए. यानि औसत में ज्यादा अंतर नहीं था. यह भी सभी जानते हैं कि राहुल द्रविड़ के रन हमेशा मुश्किल वक्त में बनते रहे. उसी तरह से भारत के सबसे ज्यादा टेस्ट विकेट लेने वाले अनिल कुंबले को भी वह सितारा हैसियत नहीं मिली जिसके वह हकदार थे.

वैसे भारतीय क्रिकेटप्रेमी बहुत ही परिणाम प्रिय होते हैं. एक जीत में खुशी आसमान छूने लगती है और पराजय में गुस्से का पारा डंडी चूमने लगता है. मुझे याद है जब 1978 व 1982 में मैं कमेंट्री के लिए पाकिस्तान गया था, तब क्रमशः कप्तान थे बिशन सिंह बेदी व सुनील गावस्कर. 1978 की पराजय में बेदी की कप्तानी गई और सुनील गावस्कर कप्तान बने. सन 1982 में जब पाकिस्तान में भारत हारा तो सुनील गावस्कर की कप्तानी छीनी गई व कपिल देव कप्तान बन गए.

अब परिस्थितियां बदल गई हैं. अब कप्तानी अनुबंधों, शोहरत, ब्रांड वैल्यू व शक्तिशाली खेमे के साथ कायम रहती है. अन्यथा 36 पर टीम के आउट होने व पराजित होने के बाद कप्तानी कायम रहना मुश्किल था. तब तो और भी मुश्किल जब स्थानापन्न कप्तान रहाणे की टीम घायल खिलाड़ियों के साथ ऑस्ट्रेलिया जैसी मजबूत टीम को उनके घर में ही हरा दे.

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मुझे खुशी है कि अजिंक्य रहाणे ने अपनी जीत को सिर पर नहीं लिया है. उन्होंने बड़ा ही विनम्र वक्तव्य दिया है. विराट कोहली टीम के कप्तान हैं और मैं उनका उप कप्तान. भारतीय क्रिकेट के हित में यह अच्छा ही हुआ कि कप्तानी के पद के अब तीन दावेदार हो गए हैं. विराट कोहली, रोहित शर्मा और अजिंक्य रहाणे. यह प्रतिद्वन्दिता बनी रहेगी. हम क्रिकेट के पंडितों को भी बहस के लिए मौका तो मिलता ही रहेगा. (डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं.)

ब्लॉगर के बारे में

सुशील दोषीकाॅमेंटेटर

लेखक प्रसिद्ध काॅमेंटेटर और पद्मश्री से सम्मानित हैं.

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