OPINION: कौन कहता है कि संसद में अब पहले जैसी गरिमापूर्ण बहस नहीं होती– News18 Hindi

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नई दिल्ली. एक अरसे बाद संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की बातों पर विपक्ष हंगामे पर उतारू नहीं था, बल्कि पीएम नरेन्द्र मोदी की बातें सुन कर पूरी की पूरी राज्यसभा भावुक थी. गुलाम नबी आजाद (Ghulam Nabi Azad) की तारीफ करते हुए और उनके साथ अपनी पुरानी यादों को ताजा करते हुए पीएम मोदी इतने भावुक हो गए कि उनकी आंखों से आंसू छलक उठे और दो पल के लिए उनका गला भी रुंध गया. मौका था राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद समेत सदन के 4 सांसदों के विदाई समारोह का. शायद कांग्रेस के नेताओं को भी इतना इल्म नहीं था कि पीएम मोदी और गुलाम नबी आजाद के बीच ऐसे संबंध भी होंगे, क्योंकि मोदी सरकार बनने के बाद कांग्रेस के नेताओं के लिए एक लकीर खींच दी गयी है, जिसमें पीएम मोदी की तारीफ करना या फिर उनसे अच्छे रिश्ते रखना संभव नहीं हो पाता है.

दोनो नेताओं की शुरुआत देखें तो कहीं से भी कोई समानता नजर नहीं आती. एक तरफ गुलाम नबी आजाद थे, जिन्होंने अपना करियर ही राजनीति को बनाया था तो दूसरी तरफ गुजरात से प्रचारक नरेन्द्र मोदी, जिन्होंने 51 वर्ष की आयु तक कोई राजनीतिक या प्रशासनिक पद नहीं पाया तो दूसरी तरफ आजाद साहब हैं, जिन्हें अपने राजनीतिक जीवन में हर पद पर रहने का मौका मिला. पिछले सात सालों से दोनों नेता राज्यसभा में आमने सामने बैठते रहे. पिछले कुछ दशकों में पीएम मोदी को मिले भारी जनसमर्थन ने उन्हें सत्ता के शीर्ष पर पहुंचाया औऱ सबसे लोकप्रिय नेता बनाया तो दूसरी ओर गुलाम नबी आजाद इन 7 सालों में एक ऐसी पार्टी का नेतृत्व करते रहे, जो लगातार संघर्ष ही करती नजर आती है. फिर भी दोनों नेताओं के आंसुओं ने साबित कर दिया कि रिश्ता कितना गहरा था.

पीएम मोदी का संदेश साफ था कि एक कड़े प्रशासक और कठोर दिखने वाले राजनेता के भीतर एक भावुक सा इंसान भी है, जो दोस्ती या फिर अच्छे व्यवहार से सामने वाले का मुरीद भी हो जाता है, भले ही वो उनका विरोधी ही क्यों न हो. संदेश ये भी साफ था कि सदन में तल्खियों से बचा भी जा सकता है और गरीमापूर्ण तरीके से रिश्ते भी निभाए जा सकते हैं. पीएम मोदी के भावुक पलों को देश ने कई बार देखा भी है और महसूस भी किया है. जब 2014 में बीजेपी संसदीय दल का नेता चुना गया तो भी वो भावुक हुए थे, 2012 में गुजरात के विधानसभा चुनावों में जीतने के बाद भी नरेन्द्र मोदी भावुक हुए थे और जब पार्टी विधायक दल की बैठक चल रही थी. तब का माहौल कुछ और था, लेकिन राज्यसभा में जो हुआ वो संसदीय लोकतंत्र की खूबसूरती को बढ़ा रहा था.

पीएमओ के सूत्र बताते हैं कि पीएम मोदी के विपक्ष के नेताओं से संबंध हमेशा से अच्छे रहे हैं. उनके सीएम बनने बाद सबसे पहले नेता विपक्ष अमरसिंह चौधरी के आपसी रिश्ते हमेशा से बहुत ही प्रगाढ़ रहे, भले ही विधान सभा के भीतर दोनों के बीच जमकर तकरार होती थी. लेकिन, मोदी आखिर तक हमेशा उनके स्वास्थ्य का हाल पूछते रहे और उनसे हमेशा बात भी करते रहे. मुख्यमंत्री मोदी जानते थे कि अमरसिंह चौधरी को प्रशासनिक और राजनीतिक अनुभव उनसे कहीं ज्यादा है, इसलिए उनको हमेशा इज्जत देते रहे. गुजरात में नेता विपक्ष बने शक्तिसिंह गोहिल और सीएम मोदी ऐसे वक्त में आमने सामने रहे, जब यूपीए की सरकार नरेन्द्र मोदी को रास्ते से हटाने के लिए एड़ी चोटी का जोर लगा रही थी, फिर भी जब जून 2011 में शक्ति सिंह गोहिल को दिल का दौरा पड़ा तो सबसे पहले अस्पताल सीएम नरेद्र मोदी ही पहुंचे थे.

एक और नेता जिनके साथ पीएम मोदी का विधानसभा में आमना सामना हुआ, वो थे शंकर सिंह वाघेला. दोनों संघ और बीजेपी में साथ रहे. बीजेपी को मजबूत करने का काम भी साथ-साथ ही किया. लेकिन, गुजरात की विधान सभा में नरेन्द मोदी के विदाई समारोह में दोनों के भाषणों को देखें तो लगता है कि एक दूसरे का दोनों कितना सम्मान करते थे. दोनों के रिश्तों को जब गुजरात विधानसभा के अध्यक्ष वजु भाई वाला ने सदन के सामने रखा तो नरेन्द्र मोदी की हंसीं देखते ही बनती थी. उसी बैठक में वाघेला ने नरेन्द्र मोदी को संवैधानिक तरीके से राम मंदिर बनवाने को कहा तो पीएम मोदी ने ये काम शुरू करवा कर करोड़ों भारतीयों का दिल जीत लिया.

सूत्र बताते हैं कि पीएम के कांग्रेस नेताओं आनंद शर्मा और मल्लिकार्जुन खड़गे से भी अच्छे रिश्ते हैं. हमने बीते सालों में देखा है कि नेता सदन और नेता विपक्ष के बीच तल्ख रिश्तों ने कैसे राजनीति को तल्ख किया है. जयललिता-करुणानिधि, मायावती-मुलायम सिंह यादव, ममता बनाम लेफ्ट, अमरिंदर सिंह बनाम प्रकाश सिंह बादल, लालू यादव-नीतीश कुमार, प्रेम कुमार धूमल और वीरभद्र सिंह जैसे उदाहरण सामने हैं. लेकिन, पीएम मोदी ने एक ऐसा उदाहरण पेश किया जो संसदीय गरिमा के अनुरूप था और जिसका विधानसभा के दिनों से वो अनुकरण करते रहे हैं.

लेकिन दोनों नेताओं के भावुक होने के बीच एक बात तो रह ही गयी. वो है, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर बोलते हुए पीएम मोदी के चुटीले भाषण ने न सिर्फ सत्ता पक्ष के सांसदों को बल्कि विपक्षी सांसदों को भी मुस्कुराने पर मजबूर कर दिया. संसद की गरिमा और परंपरा के मुताबिक पीएम मोदी ने किसान आंदोलन से लेकर विपक्ष के हंगामे पर भी चुटकी ली. पीएम मोदी जानते हैं कि लड़ाई सिर्फ किसान बिलों को लेकर नहीं है, बल्कि इसे लेकर चल रहे राजनीतिक उथल पुथल से भी उन्हें निबटना है, इसलिए हाथ जोड़कर किसानों से भी अपील की और कांग्रेस को भी याद दिलाया कि ये किसान बिल यूपीए सरकार ने शुरू किया था, जिसे अमली जामा मोदी सरकार ने पहनाया. आखिर कुछ तो था पीएम मोदी के इस भाषण में जो इसे अलग बना रहा है. संदेश सीधा भी था कि पीएम सबसे बात करना चाहते हैं और छुपा संदेश ये था कि विपक्ष को भी अपना अड़ियल रवैया छोड़ना होगा.

सार यही है कि राज्य सभा में दो दिनों में हुए पीएम मोदी के भाषण ने पुराने दिनों की याद दिला दी है. जब नेता कटाक्ष भी करते थे तो विपक्ष मेज थपथपाता था और विपक्ष के तीखे तेवर सत्ता पक्ष को भाते थे. ये संदेश अंदर तक गया तो एक बार फिर सदन में गतिरोध कम ही नजर आएगा.

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